रेल यात्रा – 2

दिल्ली देश की राजधानी है। और ये बात आपको शहर के हर मोड़, हर नुक्कड़ पर साध्य होते मिलेगी। यहां देश के सभी बड़े दफ्तर से लेके, बड़े अनुसंधान केन्द्र हैं। ये शहर सबका है, गरीब-अमीर, यहां-वहां कहीं का भी व्यक्ति हो, ये शहर उसे कुछ काम देगा, बहुत बड़ी हो या ना हो, पर दो वक्त की रोटी जरूर देगा। इसी कारण दिल्ली की भीड़ भी, उसके देश की राजधानी होने का एक परिचय ही है। और आज इसी भीड़ के चलते और खुद उस का हिस्सा भी होने के वजह से हमने भागते भागते अपनी ट्रेन पकड़ी। अब हम सवार हैं राजधानी से चल रही एक राजधानी में।

आज हमारी बोगी बिल्कुल सुनसान थी। उसमें बस मैं और मुकेश। कोई हल्ला गुल्ला नहीं, कुछ नहीं, बस चलती ट्रेन के इस बोगी में सवार हम दो। अगले स्टेशन तक हाल ये ही थे। हमने ट्रेन में परोसे जाने वाले तमाम व्यंजन खाए, लूडो खेला और ऐसे ही समय बीतते गया।

5 घंटे बाद ट्रेन अगले स्टेशन पर 5 मिनट के लिए रुकी। और थोड़ी ही देर में बोगी में एक पसीने से लथपथ, आर्मी का जवान बोगी में चढ़ा। उसने अपने बड़े बड़े पिट्ठू बैग सीट पर रखे और दोबारा बाहर भागा। थोड़ी देर में एक दूसरा जवान और भी एक बड़ा बैग और लोहे का बक्सा लिए बोगी में चढ़ा। पसीने से तर बतर इन लड़कों में ऐसी फुर्ती थी की क्या कहूं। होते होते इस 5 घंटो से खाली बोगी में, अब दो बड़े बड़े बक्से, ना जाने कितने बैग और दो आर्मी के जवान हमारे साथ हो लिए।

लगभग 10 मिनट तो उनके समान को यहां वहां रखने में ही लग गया, और उसके बाद वो और हम बैठे कुछ बातें करने लगे। इन दोनों लड़कों में इतनी सहजता थी की आप गदगद हो उठें। बातें करने पर पता लगा, आर्मी का जीवन कितना कठिन होता है। सुबह 3 बजे उठने से लेकर रात में ड्यूटी करने तक, क्या-क्या नहीं है जो इनकी रोज की जिंदगी बनाता है। 5 मिनट के अंदर खाना खा कर, खाए के बर्तन धो कर, फिर कसरत और पढ़ाई में लगना, हम और आप सोच भी नहीं सकते। हैरत की बात है की दोनों ही कहने लगे की मजा आता है ऐसे इन्हें। इन दोनों को अब 6 महीने बाद घर जाने की छुट्टी मिली है, और फिर 14 दिन बाद एक नई जगह तबादला है। इनमें से एक लड़का अपने परिवार को बिना बताए अचानक घर पहुंचने वाला है, अपने मां-बाबा को चकित करने के लिए। दूसरा लड़का कहने लगा उसके परिवार में पिता से लेके, दोनो जीजा, सभी आर्मी में हैं। मां का देहांत 7 साल पहले हो गया है, और अभी घर में दीदी का 8 महीने का बेटा है जिससे मिलने जाने के लिए वो काफी आतुर है।

ऐसे ही कुछ आधा एक घंटा बात करने के बाद, दोनों अपने साथ लाया खाना खाने लगे। एक बात जो मैंने उनसे पूछी वो थी, की तमाम देश भक्ति की फिल्में बनती हैं, आप देखने जाते हो बटालियन से? जवाब में उन्होंने बोला जब कभी पिक्चर देखने जाने के मौके मिलते भी हैं तो हम सोना पसंद करते हैं, फिर चाहे वो हॉल में ही क्यों ना हो, क्योंकि समय ज़ाया ना करके बेहतर है की हम जो भी थोड़ा समय मिले उसमें शरीर को आराम दे सकें। ये सुनकर मुझे वो तमाम आए दिन होने वाले “बायकॉट फलाना फिल्म – ढिमकाना फिल्म” पर समय बर्बाद करने वाले इन्हीं की उम्र के नौजवानों की याद आ गई। सच में, कितना जरूरी है जीवन में लक्ष्य होना, और उससे भी कितना ज्यादा जरूरी है अनुशासित होना।

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