तलवार की धार और हम

भारत में ज़िंदगी जीने का अलग तरीक़ा है। इसके अलावा की यहाँ हर व्यक्ति अपने आस पास और समाज से बहुत जुड़ा है, विदेशी लोगों के मुक़ाबले हमारी कुछ और ख़ास बातें भी हैं। फिर चाहे हमारा पहनावा हो, विचार हों, ख़ान पान हो, संस्कृति हो, यहाँ तक कि हमारा हामी भरने पर सर दाएँ-बाएँ डुलाना हो, ऐसी कई बातें हैं जो हर भारतीय में है और हर विदेशी से हमें अलग करती है। इन सबके अलावा एक और ख़ास बात है जो कि अच्छी है या बुरी आप ही बताएँ पर है अलग थलग। वो है ज़िंदगी तलवार की धार पर चलाने का तरीक़ा।

सरकार हमारे लिए लाखों क़ानून लाती है, छोटे से बड़े तक। ज़्यादातर बड़े क़ानून जैसे की समय पर टैक्स भरना, हिंसा उत्पाद में ना मिलना, इत्यादि हम सब मानते भी हैं। वो छोटे छोटे क़ानून हैं लेकिन जो गले की हड्डी बने फिरते हैं। इनको मानें तो हमारा ही भला होगा, पर तलवार की धार पर ज़िंदगी ना दौड़े तो वो मज़ा कहाँ।

उदाहरणतः आप में से ऐसा कौन है जिसने सड़क पार करी हो और चलती गाड़ियों को अपना हाथ दिखा कर रुकने का इशारा ना किया हो। और हम ख़ुद जब गाड़ी में सवार होते हैं, और कोई इशारा करते हुए सामने आ जाए तो सच में ये ही सोचते हैं, अभी कोई घटना हो जाती। इसी आदत को मैं तलवार की धार कह रही हूँ। ऐसा ही एक और क़ानून है दो पहिया वाहन चलाते समय हेलमेट पहनने का। चालक को तो हेलमेट पहनना होता ही है, किंतु यदि सवारी को भी पहनने का नियम हो तो हालात संगीन लगने लगते हैं। चालान से बचने के लिए हम क़ानून भलीभाँति मानते भी हैं, पर धार पर चलते हुए। ऐसा इसलिए कि हेलमेट के नाम पर जो देश की सड़कों में पहन के घूमा जा रहा है, उससे तरबूज़ भी शर्मसार हो जाए। मैंने कितनी बार ये बात अपने घरवालों को ही कही है कि ऐसे हेलमेट से अच्छा तो तरबूज़ या बेल का छिलका बांध लें सिर पर। ख़ैर ऐसा बिलकुल नहीं की मैं इस भीड़ का हिस्सा नहीं। ये लिखते लिखते मुझे ख़ुद अपना वो दिन याद आ रहा है जब मजबूरन ऐसा हेलमेट पहना था जिसको पूरे रास्ते ऊपर से पकड़ना पड़ा था क्योंकि बांधने की डोर एक ही तरफ़ थी! अब और क्या कहूँ, आप ख़ुद ही समझदार हैं।

वो बेदर्दी से सर काटें ‘अमीर’ और मैं कहूँ उन से

हुज़ूर आहिस्ता आहिस्ता जनाब आहिस्ता आहिस्ता

अमीर मीनाई

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