जितनी बड़ी इमारत हो, उतनी ही बड़ी उसमें रहने वालों की चिंताएँ होती जाती हैं। समाज में असमानता की खाई जितनी गहरी हो चले, इमारत में रहने वाला उतना ही अपने लिए चिंतित होने लगता है। क्योंकि उसके हिसाब से खोने के लिये उसके पास इतना है और अभी तो बहुत कुछ जबकि समेटना बाक़ी है। सुख सुविधाएँ पैसा देख के ही आती हैं। वो ग़लत कहते हैं कि पैसा सुख नहीं दे सकता। ठंडे कोहरे घने मौसम में सिर पर छत, बदन पर गरम पोशाक, सामने हीटर या हल्की सुलगती अंगीठी ही सुख देती है, कोई फ़क़ीरी के अफ़साने नहीं। ऐसी सुख सुविधाएँ सब चाहते हैं। जिसके पास है वो बचाना चाहता है, जिसके पास नहीं वो कमाना चाहता है। इसी बचाव और कमाओ की चाहत में सामाजिक नियम बनते हैं।
ऐसा ही एक नियम अभी हमारी सोसाइटी में बना है कि समान और खाना डिलीवर करने वाले लोग अपना कोई पहचान पत्र गेट में दिखाएँगे और जमा करेंगे, उसके बाद ही उन्हें सोसाइटी में दाख़िला मिलेगा। इस नियम का मुझे भी आधार समझ नहीं आया क्योंकि पहले ही हर व्यक्ति का नाम पता इत्यादि गेट पर लिखवाया जाता ही था। और पहचान पत्र देखने तक तो ठीक था, पर जमा करवाने वाली बात मुझे भी हज़म हो नहीं पाई। लेकिन जिस किसी नियम से आपको व्यक्तिगत रूप से परेशानी ना हो, उस पर आप उलझना चाहते नहीं। लेकिन उस रोज़ जब एक खाना डिलीवर वाले का वार्तालाप हमारे सिक्योरिटी गार्ड्स से मैंने सुना तो लगा कैसे एक ही नियम किसी के लिये सहूलियत और किसी के लिए आत्मसम्मान पर चोट की बात हो जाता है।
हमने खाना मंगाया था शायद, और डिलीवरी वाले व्यक्ति को नियमतः गेट पर रोका गया। नाम लिखा गया, फोटो खींची, और पहचान पत्र जमा करने को कहा गया। इस बात पर ये व्यक्ति नाराज़ हो गया। उसे अपनी पहचान और एक चोर की पहचान में कुछ अंतर नहीं दिख रहा था। ग़ुस्से में उसने हमें फ़ोन किया कि आप बात करिए गार्ड से। पूरी बात जानने पर लगा की अभी हम तीनों ही मजबूर हैं, गार्ड क्योंकि उसको कहा गया है ऐसा करने के लिए, हम क्योंकि हम यहाँ के रहने वाले हैं , और डिलीवरी आदमी क्योंकि नियम उसके लिए बने हैं। वो लेकिन इकलौता था जो इस बात से लज्जित था। उसने तब बोला हमें की आप ये नियम बदलवाएँ, ये नौकरी मैं शौक़ से नहीं कर रहा हूँ, बल्कि मजबूरी है। चोर नहीं हूँ मैं। ये बस पार्ट-टाइम है, अच्छी नौकरी मुझे जल्द ही मिल जाएगी।
अब जो ज़िल्लत वो कुछ देर पहले महसूस कर रहा था, उसको मैं समझने लगी थी। क्योंकि उसके शब्दों में अब ज़िल्लत या दुख नहीं , जज़्बा-ऐ-ख़ुद्दारी थी।