रात के १२:३० बज रहे हैं। घर में शांति है। सब सो रहे हैं। इस वक्त किसी के पास और कोई अनुभूति नहीं सिवाय नींद के। मेरी ये किस्सागो की दुकान भी कई हफ़्तों से ऐसे ही सोए हुई है। पहले तक मैं ना जाने क्या क्या लिखती थी। झूले पर झूलते बच्चों से लेकर बस में सवार यात्री तक, कभी दिये बेचने वाले की बात, तो कभी रेस्टोरेंट में लोगों पर गौर करने के पल। लिखने बैठती तो सब कुछ ऐसे बाहर आता जैसे दूध तेज़ आँच से आतुर होकर उबलने को बेचैन है। बस अपनी बेहद सीधी सादी कहानी को भी मैं सब से साझा करती। पर अब कई हफ़्तों से ये क़िस्सों का पिटारा बंद पड़ा है। ऑफिस से छुट्टी क्या ली, क़िस्से भी ख़त्म हो गए। ये नहीं की अब कुछ चल नहीं रहा लिखने लायक़ जीवन में। बल्कि बेहद ख़ास पल चल रहे हैं। अपने छोटे से बच्चे को रोज़ थोड़ा और बड़ा होते देख विचारों का भूचाल आता है मन में। पर ये इतने तूफ़ानी विचार और भावनाएँ हैं कि इन्हें मैं अपनी सादी सी कहानियों की माला में पीरो नहीं सकती।
घर में रह कर घरेलू काम आपको कितना दुनिया से दूर ले जाते हैं ये समझ आ रहा है। आपकी दुनिया चार दीवारों में बंध जाये तो क़िस्सों की माला वहीं बस चार मोती भर रह जाती है, उन्हीं चार दीवारों के मोती। बेहद सामान्य क़िस्से भी झोली में समा नहीं पाते। कितना ज़रूरी हैं घर से बाहर निकलना। एक जीवन में हज़ार जीवन आप विचारों और अनुभूतियों से जीते हैं। ये आपको संवेदनशील बनाने के लिए भी महत्त्वपूर्ण होते हैं। भरी दोपहरी में चिलचिलाती धूप में सब्ज़ी बेचते रेड़ी वाले को देख, आसमान के भाव चल रहे दामों का कुछ मतलब समझ आता है। चाय की दुकान पर हंसते हुए लोगों को पानी जैसी पतली चाय का मज़ा लेने का कारण समझ आता है। थोड़े हाय-फाय रेस्टोरेंट में लैपटॉप लेकर और साथ में कॉफ़ी की चुस्की लेते लोगों को देख लोगों के शौक़ की झलक मिलती है। पर ये सब तब , जब आप घर से बाहर निकलें। भारत की सड़कों, दुकानों और कोई भी पब्लिक स्थान पर आपको औरतों की संख्या गिनती भर की मिलेगी। वे मूलतः आपको घर में काम करते दिखेंगी। अपने क़िस्सों का पिटारा बंद कर, उनमें बस घरेलू बातों की वही परत रोज़ चढ़ते उतारते दिखेंगी। उनकी बातों का दायरा घर के चार लोगों तक सीमित रहता दिखेगा। और यदि इस सबको देख कर भी आपको कभी ये विचार आज तक ना आया की कैसे एक इतने बड़े वर्ग को उनके अपनी पूर्ण क्षमताओं से समाज ने वंचित किया हुआ है, तो आज इस पर विचार करें। इसका ही एक कारण है कि क्यों हमारी फ़िल्मों में पुरुष ही सर्वे-सर्वा है। क्योंकि हमारी महिलाओं के जीवन में तो इतना कुछ ख़ास हो ही नहीं रहा जिसकी झलक आपको दिखाई जाए। इससे बड़ी ज़्यादती क्या होगी किसी के साथ। हाय री दुनिया।
इतने घने बादल के पीछे, कितना तनहा होगा चाँद।
– परवीन शाकिर