ऑफिस से आते वक़्त मुझे एक नारियल पानी वाला रोज़ मिलता है। वो एक नौजवान लड़का है। चाहे मुझे नारियल चाहिए हो या नहीं, पूछता ज़रूर है कि “दीदी नारियल पियोगी?“ मैं ज़्यादातर मना कर देती हूँ। पर उसका सड़क में अपना जालीदार वाहन लगाये खड़ा रहना मुझे उस सड़क के पूरे होने का एहसास देता है। शायद आदत सी हो गई है। अभी पिछले दिनों दिवाली का त्यौहार था। नारियल वाला धनतेरस के बाद से अपना ठेला बंद करके गया था। ऐसा नहीं की मैं उससे रोज़ ही दुआ सलाम करती हूँ, पर मुझे चीज़ें ध्यान रहती हैं और याद रह जाती हैं। उसके ऊपर मैं थोड़ी बातचीत में रुचि रखने वाली इंसान हूँ। तो इन सब कारणवश मुझे ये रोज़ ध्यान रहता की ये लड़का दिवाली पर घर गया होगा और नारियल का ठेला इसी कारण खुलता नहीं।
अभी परसों दिवाली के लगभग छः दिन बाद मैंने ठेला वापस खुला देखा। बाबा से बोला की चलो आज नारियल ले लेते हैं। मुझे आते देख वो बोला “दीदी कितने नारियल दूँ”? मैंने बोला तीन। अब जब हम वहीं खड़े थे तो मैंने उसको कहा, “दिवाली तो बहुत अच्छी रही तुम्हारी, काफ़ी दिन से दुकान बंद थी”। वो बोला मेरा भाई चला गया था। मुझे लगा दोनों साथ में अपने गाँव गए होंगे दिवाली पर। तो वो बोला “नहीं, घर तो मैं बस अकेला गया था, पर मेरा भाई संसार छोड़ के चला गया”। मुझे बहुत ही अजीब लगा की कहाँ मैं उसकी अच्छी दिवाली का ज़िक्र कर रही थी और कहाँ इसके घर में ऐसा वाक़या हो गया। तो मैंने यूँ ही पूछ लिया की बड़ा भाई था? तो जवाब में उसने कहा नहीं बारह साल का था। मेरी सकबकाहट और बढ़ गई। मैंने ये जवाब तो सोचा भी नहीं था। तो अंत में मैंने पूछा “बीमार था क्या”, जवाब में वो बोला “नहीं कूएँ में गिर गया वो”। मुझे उसकी बात से इतना दुख हुआ कि मैं अब वहाँ से बस निकल जाना चाहती थी और मैंने वैसा ही किया।
चलते चलते सोचने लगी , कौन क्या जाने किसकी क्या व्यथा है। सड़क में चलते अनगिनत चेहरे हैं, और हर चेहरे की एक कहानी, जिसमें उनके हिस्से के सुख-दुख सजे हैं। जब तक सड़क पर हैं तब तक कहानियाँ भी हैं। और जैसे ही सड़क के पार, तो फिर चाहे वो नाम था या बदनाम था, अब बस गुमनाम बनके रह गया।