ट्रैफिक लाइट

चिलचिलाती धूप में, मैं अपनी गाड़ी में बाहर निकलती हूँ। AC को अपने सबसे ज्यादा जोर में चलाने की जरूरत महसूस होती है। निकली ही थी की ट्रैफिक लाइट में रुकने का संकेत मिला। ये संकेत देखते ही मुझे मन में झुरझुरी होने लगती है। ये नहीं की मुझे सब्र करना नहीं आता , और ऐसा भी नहीं की १-२ मिनट की देरी में जिंदगी में कुछ बड़ा बलाव आ सके। पर फिर भी ये लाल बत्ती, रुकी हुई गाड़ी में बैठी मेरी बेचैन आत्मा को रौंध देती है। फिर चाहे वो जोधपुर हो, या दिल्ली, या हल्द्वानी, या बंगाल, या कहीं भी। क्यूंकि हर जगह की लाल बत्ती की वही कहानी है, वही पात्र हैं, और वही अंत है।

जैसे ही गाड़ी रूकती है, ५-६ साल से लेके १०-१२ साल के बच्चे आके खिड़की खटखटाने लगते हैं। वो खटखटाहट किसी सनसनी से भरी पिक्चर में रात के बारह बजे हुई दरवाजे पे दस्तख से कम नहीं होती। हर बच्चे की शक्ल एक जैसी है। कभी ये गुब्बारा बेचते हैं , कभी पेन , कभी फूल, कभी खिलौना। पर आप नज़र भर मिला लें इनसे तो आप समझ जाएंगे ये आपको बस अपनी कहानी बेच रहे हैं। वो कहानी जिसमें सब कुछ की कमी है , संसाधन की , धन की , प्रेम की , साफ पानी और हवा की। कमी नहीं है तो बस दुःख की, और मजबूरी की। उन आँखों से इसलिए मैं नज़र नहीं मिला पाती क्यूंकि वो कहानियां मुझे बेचैन कर देती हैं। एक एक सामान जो ये बच्चे बेच रहे होते हैं , उस सबके हकदार वो खुद हैं। वो गुब्बारे से खेलने का मज़ा, पेन से अक्षर लिखना और दुनिया जहां के चित्र बनाना , फूल की खुशबू सूंघ कर खिलखिलाना , डोरेमोन हेलीकॉप्टर इत्यादि उन सब खिलौनों से खेल कर विचारों के उन्मुक्त आसमान पर पंख पसार के उड़ना, इन सब का अधिकार वो बच्चे के पास होना चाहिए।

जैसे ही हरी बत्ती जलती है मेरी आत्मा पुनः हरी हो जाती है और उसका ढांचा फिर दुरुस्त। वो बच्चों की उम्मीद और मेरे मन की बेचैनी थोड़ी एक जैसी हैं, दोनों ही ट्रैफिक लाइट पर बनती-बिगड़ती हैं , एक की लाल से हरी होने पर, और दूसरे की हरी से लाल। अच्छा ही है इस दुनिया में अनेक रंग हैं , क्यूंकि बस काला – सफेद तो यहां वैसे भी कुछ नहीं।

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