आज सवेरे जब मैं हवाई अड्डे पर अपने विमान का इंतज़ार कर रही थी तो कुछ रोचक अनुभूतियाँ देखने का अवसर मिला। सामाजिक स्थानों पर बैठकर एक चीज़ हमेशा मेरे दिमाग़ में आती है, कि जिसको देखो वो गर्दन झुकाए मोबाइल में व्यस्त है। ये देख मैं वो समय याद करने की कोशिश करती हूँ की जब हमारे पास इतने संसाधन नहीं थे, मतलब २०१० से पहले का समय, तो हम लोग बस, ट्रेन, हवाई जहाज इत्यादि का इंतज़ार करते समय क्या किया करते थे? मुकेश कहता है वो हमेशा कॉमिक्स ख़रीदता था ताकि अलीपुरद्वार से बिहार जाते समय बोर ना हो, मुझे याद है मैं भी चंपक पढ़ती थी, पर बाकि समय ऐसा करते क्या थे जो आज सोचना भी असंभव लगता है! मुझे सच में इस सवाल का जवाब चाहिए नाना प्रकार के लोगों से।
ख़ैर मोबाइल में झांकते हुए लोगों के अलावा कुछ और भी क्रियाएँ देखने को थी। जैसे की एक नवविवाहित जोड़ा जो मेरे सामने ही बैठा था। नवविवाहित लोगों की ऊर्जा, चिहचिहाहट किसी सुंदर चिड़िया से कम नहीं होती। यहाँ तक कि इस जोड़े की वधु तो ऐसी लाजवाब सजी थी की चिड़िया जैसे तमाम बेधड़क रंग भी बिखरे हुए थे। इस चिड़िया, माफ कीजिएगा, वधु ने कान में बड़े से झूमके डाले थे, हाथों में चूड़ियाँ सजी थीं, नाक में बड़ी सी लौंग थी, और गले में लंबा मंगलसूत्र। गुलाबी कपड़ों में ये सुनहरे आभूषण चमचमा रहे थे। दोनों ने लाखों सेल्फ़ी खींचीं, हंसते मुस्कुराते बातें करते। पर कुछ समय बाद लड़की अपनी नाक की लौंग निकालने लगी। उसका साथी भी मदद करने लगा। दोनों लाख कोशिश करते पर लौंग बाहर आ नहीं पा रही थी। इस प्रक्रिया में लड़की की दर्द से आँखें भर आईं। बहुत देर के बाद लौंग निकल ही आई। शायद उसको ज़ेवर इतने ख़ास थे नहीं की अब उसने कान के झुमके भी उतार कर अपने पर्स में सम्भाल लिए। सब हो जाने के बाद उसके चेहरे पर सुकून था। और सेल्फ़ियों का ज़ोर पुनः शुरू हुआ। ये देख मुझे गुलज़ार की पंक्ति याद आ गई:
पाँव मे पायल,बाँहों में कंगन
गले में हँसली ,कमरबंद च्हहले और बिछुए
नाक कान छिदवायें गये हैं
और जेवर जेवर कहते कहते
रीत रिवाज की रस्सियों से मै जकरी गयी
उफ्फ !!कितनी तरह मै पकड़ी गयी
अब छिलने लग है हाथ पांव
और कितनी खरासें उभरी हैं
कितनी गिरहें हैं खोली है मैंने
कितनी रस्सियाँ उतरी है
गुलज़ार
थोड़ी देर में अब मेरे सामने पाली का एक परिवार बैठ गया। परिवार में आदमी, औरत और उनका एक साल का बच्चा था। पिता अपने बच्चे को देख ऐसे खुश थे की क्या कहूँ। बच्चे ने पैर में इतनी मोटी पायल पहनी थी जितना मोटा उसके आँख में काजल। बच्चा लुढ़कते हुए मेरे पास आ गया। मैंने ऐसे ही मुस्कुराते हुए बच्चे से कहा, “बड़ी मोटी पायल पहनते हो तुम”, तो पिता गर्व से कहने लगे “मैडम चाँदी की है ये, सिक्योरिटी वालों ने उतरवा के तक देखी”। पिता को उस पायल में शायद अपना श्रम और बच्चे की सुंदरता दोनों दिख रहीं थी। मैंने भी कह दिया “बहुत सुंदर हैं”।
ये सब और बहुत कुछ के बाद हम विमान में बैठ गये। छोटे शहरों से चलते विमानों में भी अलग माहौल होता है। इस विमान में एक ही परिवार के १०-१५ लोग थे शायद। पूरी यात्रा में जितना खाना उन्होंने अपने बैग से एक दूसरे को जा जा कर खिलाया और खाया है, उतना शायद विमान के कर्मचारियों के पास भी नहीं था! अगर इस परिवार ने विमान सहकर्मियों के जैसे कपड़े पहने होते, तो शायद मैं उनसे एक चाय तो ऑर्डर कर ही चुकी होती!