बदलते शहर, बदलती आवाम

जब स्कूल में पढ़ते थे, हमारी सुबह की असेंबली में रोज़ तीन बार गायत्री मंत्र गाते थे, फिर एक अंग्रेज़ी प्रेयर होती थी, उसके बाद एक हिन्दी की, फिर राष्ट्रगान, और फिर समाचार और एक विचार। इसके बाद पढ़ाई शुरू।इस असेंबली से कभी किसी को व्यक्तिगत या वैचारिक परेशानी नहीं होती थी। हाँ मेरे जैसे थोड़े कमजोर बच्चे धूप में चक्कर खा के गिरते थे कभी कभी, पर वो कोई ख़ास परेशानी नहीं बल्कि आराम का कारण हो जाता था।

घर से हमारे पाषाण देवी का मंदिर दिखता था। ठंडी सड़क में आपको बहुत मंदिर मिलते , पर पाषाण देवी के मंदिर में जब कोई बड़ा सा लटका हुआ ताँबे का घंटा बजाता तो पूरा शहर गूंजता, बड़ा अच्छा लगता था। शाम होते होते कचहरी का साईरन बजता ये कहने को की ५ बज गये हैं, गौधूली बेला है, बच्चे खेलना शुरू करें और माँ बाप अपने ऑफिस इत्यादि से घर को रवाना हो जाएँ। ६ बजे के आस पास मस्जिद से अल्लाह हो अकबर की आवाज़ फिर शहर को गूंजा देती थी। इन सब आवाज़ का हमें कभी आस्तिक मतलब ना लग के समय कितना हो गया है इसका एहसास ज़्यादा रहता। क्योंकि तब आस्था, धर्म इत्यादि की बातें लोग उतना करते ना थे। ख़ास कर हमारे घर में माँ बाबा ने तो हमसे ये बातें शायद ही कभी करी हों। हाँ हनुमान चालीसा और कुछ मंत्र हमें दोनों ने ना जाने कब ऐसे ही सीखा दिये और हम तीनों बहनें सीख भी गये। आस्था हमारा बेहद निजी मामला था शायद। नंदा देवी के मेले में भी ज़्यादा शौक़ झूलों का होता था, और मंदिर को बहुत बार बस बाहर से नमस्कार करने का चलन था ,कम से कम मेरा तो।

ईद में हमारी दोस्त मिदहत के घर जाके हम सेंवई खाते थे। ईदी में आंटी हमें मंच चॉकलेट देती थीं। वहीं से ईदी का मतलब समझ आया था। कभी मेथडिस्ट चर्च भी जाते थे। वहाँ क्या करना है समझ नहीं आता था, पर शायद ही कभी इन सब जगहों को हम बच्चों ने समझने की कोशिश करी, और शायद ना ही हमारे माँ बाप ने हमें समझाने की। उत्सुकता होती या वहाँ लगे फूल सुंदर लग रहे होते, या वहाँ बाहर बरामदे में फैलाये हुए पत्थर पर चलने की और खेलने की इच्छा होती तो चले जाते। ना कोई रोकता, ना हम रुकते।

इन शहरों में रहने वाले अब भी वही सब लोग हैं। समाज को चालाने वाली ज़रूरतें भी वही हैं। यहाँ तक की कुरीतियाँ तब भी वही रही होंगी, जो आज भी हैं। बस विचार बदल गये हैं, और विचार ने इंसान बदल दिये हैं। अब जितनी आस्था पर बातें होती हैं, पहले कभी नहीं हुई। कौन क्या है सब जानना चाहते हैं। किसी को अब मंदिर से बजने वाला ताँबे का घंटा अब ये नहीं लगता कि कैसे आवाज़ गूंजने लगी, किसी को अब कचहरी की आवाज़ गौधूली बेला का संकेत नहीं लगता, और मस्जिद से आने वाली पुकार भी और उसका मतलब भी अब बस शाम का ६-६:३० होने का संकेत नहीं लगता। सबको बस लगती है, तो हर ये आवाज़ शोर लगती है, किसी को कोई आवाज़ और किसी को कोई। जिस दिन ये सब “शोर” बंद हो जाएँगे तब जो भयानक शांति सबके कान फाड़ने को आतुर होगी, उसका डर किसी को नहीं लगता।

2 Comments

  1. I enjoy reading your blogs. They never fail to refresh my mind and sometimes even leave me in awe. Your concluding line is particularly impressive. I hope more people will come to understand it in due time.

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