शोक और यादें दोनों एक दूसरे से ऐसे अभिन्न हैं जैसे माला में धागा और मोती। एक को दूसरे में पिरो कर रखें तो ही दोनों का मूल्य है। शोक करने से बीती यादें ताज़ा हो जाती हैं और यादों से शोक को झेलने की शक्ति मिलती है। मेरे ससुर जी, श्री इण्दल राय, जिन्हें मैं बाबूजी कहकर पुकारती थी, का इस साल स्वर्गवास हो गया। जैसा की मेरी आदत है कि मैं अपनी हर अनुभूति को एक लेख में व्यक्त करना चाहती हूँ क्यूंकि उससे मेरे विचारों को एक दिशा मिलती है । ऐसा ही मैंने तब सोचा था । बाबूजी की तेरहवीं के बाद जोधपुर वापस आते समय मैंने कुछ लिखना शुरू भी किया था, पर तब मेरे अंदर का शोक अपने आस पास रहे सभी लोगों के शोक में धुंधला हो गया था । क्या विचार मेरा है क्या किसी और का, इसमें मुझे भिन्नता नहीं दिखाई दे रही थी । बाबूजी मेरे जीवन में बेहद ख़ास व्यक्ति थे, और इसलिए मैंने तब ना ही कुछ बाहरी रूप से व्यक्त किया और ना ही लेख कि रूप में । बाबूजी को मैं वैसे याद करना चाहती थी और हूँ जैसा मैंने उनके साथ अनुभव किया । और आज ३ महीने बाद मुझ में वो सब व्यक्त करने के लिए अपनी यादें और शोक दोनों हैं जिनमें किसी और की भागीदारी नहीं है ।
बाबूजी का व्यक्तित्व बेहद अलग था । अमूमन आप किसी को फ़ोन करके प्रणाम कहें तो सामने वाला आपको “जीते रहो, या ख़ुश रहो” इत्यादि कहेगा । बाबूजी को यदि आप प्रणाम कहो तो वो अपने जिंदादिल तरीक़े से पूरे जोश में कहेंगे “स्वस्थ रहो, मस्त रहो, तंदरूस्त रहो”। मैंने ऐसा आशीर्वाद आज तक ना किसी से सुना है और ना ही मुझे लगता है ऐसा और कोई दूसरा होगा। बाबूजी बहुत ही साहसी इंसान थे जो मुझे लगता है पत्थर में भी जोश भर दें । अपनी phd के समय में जब-जब मुझे लगता की जीवन और भविष्य बहुत अनिश्चित है, मैं बाबूजी से बात करती और वो कहते, “मुश्किल से मिलने वाली चीज़ें ही स्वर्ग सी ख़ुशी देती हैं, ये समय है जब तुम्हें बस मेहनत करनी है और डरना नहीं है”। उन्हें याद करो तो बस प्रोत्साहन देने वाली बातें ही याद आती हैं । कहते थे “मर्द चले तो मोती झड़े, बैठे तो गोबर”। कभी उनको अपनी कोई उपलब्धि के बारे में बताओ तो वो बधाई देने के साथ-साथ कहेंगे अभी तुम्हे और मेहनत करनी है, और बहुत आगे बढ़ना है।
मुझसे मिलने जब वो एक बार IIT दिल्ली आए थे, तो उन्होंने घुसते ही पहले IIT की मिट्टी से अपने माथे पर तिलक लगाया था। ये सब किसी को दिखाने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए क्यूंकि वो कहते मेरा सौभाग्य है की मैं इस मिट्टी को महसूस कर पा रहा हूँ । तब वो बहुत ख़ुश थे की जहाँ मुझे मेरे बेटे नहीं लाए, वहाँ मैं अपनी बहू के कारण आ पाया हूँ । ऐसी बातें मुझे भी एक अलग अपनापन और प्रोत्साहन देती थीं । जब जोधपुर में वो मेरे ऑफिस आए, उन्होंने कई देर मेरी कुर्सी पर बैठ कर फ़ोन में बात करी। आप समझ ही गए होंगे की मेरी कुर्सी पर बैठने से पहले उन्होंने उसको प्रणाम किया । ऐसे मासूम और सच्चे सम्मान से मुझे बहुत ख़ुशी होती थी की मैं उनसे मिल पाई । बाबूजी ने हमेशा मुझे इतनी इज्जत दी जिसकी ना जाने मैं कितनी ही हकदार हूँ ।
हमेशा सामाजिक जीवन जीने वाले बाबूजी जोधपुर आकर एक क़ैद पंछी जैसा महसूस करते । इस कारण आस पास की दुकानों पर बैठे रहते । दोस्त बना लेना उनके लिए बहुत आसान था, इतना की उनके वापस बंगाल चले जाने के कई महीने बाद भी कितने लोग पूछते रहते कि वो कहाँ गए। आज हमें भी लगता है की इतना ज़िंदादिल आदमी सच में कहाँ चला गया । सोचा था बाबूजी को घुमाएँगे यहाँ वहाँ, उनकी आधी अधूरी पासपोर्ट की एप्लीकेशन मेरे कंप्यूटर में पड़ी हुई है, जिसको अब हमेशा के लिए डिलीट करने का समय आ गया है ।
बाबूजी पूजा-पाठी आदमी नहीं थे । वे इंसान की इज़्ज़त करते, मन से भगवान को मानते, पर मंदिर मंदिर घूमने का उनको शौक नहीं था । पर जब – जब हम अलीपुरद्वार से वापस आ रहे होते, बाबूजी हमारी चलती ट्रेन को बाहर से एक बार हाथ लगाते और प्रणाम करते, ये ही कामना रखते हुए की हमारी यात्रा सफल हो । घर से निकलते समय पैसे देते और उसमें हर तरीके का नोट होता। सामने वाले को किसी भी तरीके से दिक्कत ना हो ये बात का हमेशा उनको ध्यान रहता । आज जब बाबूजी नहीं रहे तो घर अधूरा हो गया है। आदि अपने दादाजी को नहीं जान पाएगा इसका अफ़सोस मुझे हमेशा रहेगा पर आदि को मैं हमेशा चाहूँगी की अपने दादा जैसा ईमानदार, कर्मठ और सामाजिक व्यक्ति बने। पंचतंत्र की कहानियों जैसे किस्से हैं बाबूजी के हम सब के पास उनकी याद के रूप में। मजेदार और सीख से भरपूर। बाबूजी एक rockstar का जीवन जिए और रॉकस्टार के जैसे ही सब का दिल छू कर चले गए अपनी यात्रा में, हमसे आगे । जहाँ भी हैं मज़े में रहिए बाबूजी, हम सब भी इधर स्वस्थ, मस्त और तंदरूस्त रहेंगे ।
अलविदा बाबूजी!
बेहद सुंदर अभिव्यक्ति।
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