तंग सड़क

तंग सड़कें अक्सर उस पर सफर कर रहे लोगों को परेशान कर देती हैं। ऐसी सड़कें आपको हमारे शहरों से लेकर छोटे-छोटे क़स्बों, और गाँवों की हर गली में मिल जाएँगे। सड़कें एसी कि उन गड्ढों में आदमी धान रोप दे, या तो मछलियाँ ही पाल ले। ऐसी सड़कों पर अच्छी बड़ी और शॉक ऐब्सोर्बर कार में सवार हों तो मसला कम होता। पर गड्ढों के अलावा इन सड़कों की दूसरी खासियत है की ये पतली भी इतनी होती हैं की इनकी चौड़ाई से ज़्यादा इनमें बसे गड्ढों की गहराई होती है! तो गाड़ी यदि बड़ी और आरामदायक हो भी, तो भी उसका पूरा आराम तब ही मिल पाता है जब आपको कोई दूसरी गाड़ी ना मिल जाए सामने से आती हुई। और आज जब औसतन सबके घरों में एक-एक गाड़ी तो है ही, ऐसा सोचना भर भी कि सामने से गाड़ी ना मिलेगी, आप पर कार्यवाही कराने योग्य विचार है। तो बचते हैं छोटे रिक्शा चाहे आटोरिक्शा हो या ई-रिक्शा, जो इन सड़कों की रग-रग, मतलब गड्ढे-गड्ढे से वाकिफ होते हैं और निहायती वाहियात शॉक ऐब्सोर्बर होने के बावजूद भी यात्रा संपन्न कर देते हैं। आज गली मोहल्ले की सड़कों की चरमराती दशा पर मुझे इसलिए विचार आया क्यूंकि एक ऐसी ही सड़क है जिसको मैं अच्छे से पहचानती हूँ, लगभग २० साल से देख रही हूँ की उसकी सूरत में बने ये चांदनुमा धब्बे कभी नहीं भरे, पर फिर भी इस तंग गली और सड़क ने मुझे कभी तंग दिल ना किया। क्यूंकि ये सड़क मेरे घर को मूढ़ती है। अपने घर में और एक सुकून जो मिलता है, जिसमें कोई दिखावा नहीं होता, कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं होती, जहाँ आप जैसे हैं वैसे ही काफ़ी होते हैं, वैसा ही सुकून मुझे इस सड़क को देख कर मिलता है। ये कभी ना भरने वाले गड्ढे, मोढ़ पर ये दुकान, एक ओर मंदिर, और मंदिर से लगा ये ऊँचा विशाल पेड़ देख कर ऐसा लगता है जैसे बोलते बोलते बात आधी कट गई थी और अब जब साल भर बाद मैं फिर घर आई हूँ तो ये सब वो आधी कहीं बात जो बीच में ही कहीं रुक गई थी, पूरी करने के इंतज़ार में एकदम स्थिर बैठे हैं। सच कहूँ तो यहीं से लगने लगता है कि घर पहुँच गई हूँ।

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